मिट्टी के घर से सीमेंट की छत, कच्चे रास्तों से पक्की सड़कों तक, बैलगाड़ी से चार पहिया वाहन तक की यात्रा को आज हम “विकास” कहते हैं। बिजली, मोबाइल, इंटरनेट और आधुनिक सुविधाओं ने जीवन को पहले से अधिक सुविधाजनक बनाया है। लेकिन इसी तथाकथित विकास की कीमत क्या है ? यह प्रश्न आज पहले से अधिक गंभीर हो गया है।
नदी, नाले, पठार और पहाड़ विकास की योजनाओं में बाधा मान लिए गए हैं। जल, जंगल और जमीन जो आदिवासी और ग्रामीण जीवन की आत्मा हैं, आज खनन, हनन और अंधाधुंध निर्माण की भेंट चढ़ रहे हैं। जंगल कट रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं, पहाड़ छलनी हो रहे हैं और जमीन का संतुलन बिगड़ रहा है। इसके साथ ही विस्थापन, बेरोजगारी, प्रदूषण और सामाजिक असमानता भी बढ़ती जा रही है।
प्रश्न यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि किस तरह का विकास। क्या ऐसा विकास, जो प्राकृतिक संसाधनों को समाप्त कर दे, मानव स्वास्थ्य को खतरे में डाल दे और आने वाली पीढ़ियों के लिए संकट खड़ा कर दे, वह वास्तव में विकास कहलाने योग्य है?
आज विकास की आड़ में खनन और दमन को ठहराया जा रहा है। स्थानीय लोगों की सहमति के बिना परियोजनाएँ लागू हो रही हैं। जलवायु परिवर्तन, बाढ़, सूखा और बढ़ती गर्मी इस असंतुलित विकास के प्रत्यक्ष परिणाम हैं। यह स्थिति संकेत देती है कि यदि विकास मानव और प्रकृति के बीच संतुलन नहीं बनाता, तो वही विकास धीरे-धीरे मानव विनाश का कारण बन सकता है।
अब समय आ गया है कि विकास की परिभाषा को नए सिरे से गढ़ा जाए, जहाँ सड़क और मकान के साथ-साथ नदी की धारा, जंगल की हरियाली और जमीन की उर्वरता भी सुरक्षित रहे। सतत, समावेशी और पर्यावरण-संवेदी विकास ही वह रास्ता है, जो मानव को विनाश नहीं बल्कि भविष्य की सुरक्षा दे सकता है।
विकास यदि जीवन को बचाए, प्रकृति को सम्मान दे और समाज में समानता लाए, तभी वह सच्चे अर्थों में विकास कहलाएगा।
